आस्ट्रिया और सर्बिया के बीच युद्ध रोकने के लिए क्या क्या प्रयास किए गए ?

आस्ट्रिया और सर्बिया के बीच युद्ध रोकने के लिए क्या क्या प्रयास किए गए ?

रूस के विदेश मंत्री साजानोव ने प्रारम्भ से ही सर्बिया का समर्थन करने का निश्चय किया । उसने जर्मनी और आस्ट्रिया के राजदूतों को स्पष्ट रूप से कह दिया था कि यदि आस्ट्रिया ने सर्बिया पर आक्रमण किया तो उसे रूस का भी सामना करना पड़ेगा । फ्रांस भी रूस की नीति का पूर्ण रूप से समर्थन करने का आश्वासन दे चुका था।

युद्ध रोकने के प्रयत्न-

ब्रिटेन और जर्मनी ने युद्ध को स्थानीय बनाने (Localising the War) का प्रयत्न किया किन्तु स्थिति उनके काबू के बाहर हो चुकी थी । युद्ध रोकने के सबसे अधिक प्रयत्न ब्रिटेन के विदेश मंत्री सर एडवर्ड ग्रे ने किये क्योंकि वह यूरोप की शान्ति को भंग नहीं होने देना चाहता था । सबसे पहले उसने रूस और आस्ट्रिया के बीच सीधी वार्ता के द्वारा समझौता कराने का सुझाव दिया किन्तु फ्रांस के राष्ट्रपति के विरोध के कारण यह प्रस्ताव विफल हो गया । 26 जुलाई को जर्मनी के सुझाव पर आस्ट्रिया के राजदूत और रूस के प्रधान मंत्री के बीच सीधी-वार्ता हुई, किन्तु बर्चटोल अपनी माँगों में संशोधन करने को तैयार नहीं था। उसी दिन सर एडवर्ड ग्रे ने यह प्रस्ताव रखा कि फ्रांस, जर्मनी, इटली और इंग्लैण्ड के राजदूत लन्दन में एक सम्मेलन में भाग लें और उसमें आस्ट्रिया और सर्बिया के बीच युद्ध रोकने के उपायों पर विचार करें, किन्तु जर्मनी ने इसे अस्वीकार कर दिया ।

जर्मनी के प्रयास

वास्तव में अभी तक भी जर्मन राजनीतिज्ञों की धारण थी कि आस्ट्रिया और सर्बिया के संघर्ष का स्थानीयकरण किया जा सकता है । इस प्रस्ताव को अस्वीकार करके जर्मनी ने बड़ी राजनीतिक भूल की । जर्मनी ने आस्ट्रिया पर अपने प्रभाव का उपयोग नहीं किया अन्यथा युद्ध की स्थिति टल सकती थी । वह उसे सर्बिया के उत्तर को मानने के लिए बाध्य कर सकता था । 27 जुलाई को ब्रिटेन के विदेशमंत्री ग्रे ने जर्मनी से पुनः अनुरोध किया कि वह आस्ट्रिया पर अपने प्रभाव का उपयोग करके उसे सर्बिया के उत्तर को स्वीकार करने के लिए कहे जिससे युद्ध की स्थिति टल जाये । किन्तु जर्मनी इसके लिए तयार नही था । इस प्रकार समझौते के सभी प्रयत्न असफल रहे। पुन को गुरुमात- आस्ट्रिया द्वारा सर्बिया पर आक्रमण (28 जुलाई, 1914) के साथ ही प्रथम विश्व युद्ध की शुरूआत हो गयी । अगले दिन रूस को जब यह  सूचना मिली की आस्ट्रिया ने बेलग्रेड पर बम वर्षा की है, तो रूस के युद्ध मन्त्री ने बार को पूर्ण सैन्य-सज्जा (Mobilization) की आज्ञा देने के लिए तैयार कर लिया ।

प्रथम विश्व युद्ध की शुरूआत

का सना की लामबन्दी के कारण जर्मनी का युद्ध में प्रवेश करना अनिवार्य हो गया । 31 जुलाई, 1914 को जर्मनी ने रूस को 12 घण्टे की अन्तिम चेतावनी जिसमें उसने जर्मनी और आस्ट्रिया के विरुद्ध समस्त सैनिक तैयारियाँ समाप्त कर के लिए कहा । रूस ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया, इसलिए 1 अगस्त, 19141 जर्मनी ने रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी । इस घोषणा से पूर्व ही जर्मनी फ्रांस की सरकार से पूछा था कि रूस और जर्मनी के बीच युद्ध होने पर उसकी क्या नीति रहेगी । इसके उत्तर में फ्रांस के मंत्री ने कहा था कि हमें अपने हितों के अनुसार निर्णय करना पड़ेगा | किन्तु इसके बाद फ्रांस ने भी अपनी सेनाओं को कर करने की आज्ञा दे दी। 3 अगस्त को जर्मनी ने फ्रांस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी । इसी दिन इटली ने अपनी तटस्थता की घोषणा की।

इंग्लैण्ड का युद्ध में प्रवेश-

इंग्लैण्ड के विदेश मंत्री ग्रे ने अन्त तक युद्ध रोकने का प्रयत्न किया, किन्तु उन्हें निराश होना पड़ा । यद्यपि फ्रांस और रूस के साथ किये गये समझौते के अनुसार इंग्लैण्ड, फ्रांस या रूस का साथ देने को बाध्य नहीं था तो भी उसकी सहानुभूति फ्रांस के साथ थी | 1905 से 1912 ई० तक प्रत्येक संकट के समय इंग्लैण्ड ने फ्रांस का समर्थन किया था । इसी बीच इंग्लैण्ड और फ्रांस के सैनिक अधिकारियों के बीच गुप्त परामर्श भी होता रहा था । फ्रांस पर आक्रमण होने की दशा में उसकी सहायता करना इंग्लैण्ड का नैतिक कर्त्तव्य था, परन्तु ग्रे की स्थिति बड़ी कठिन थी । इंग्लैण्ड का लोकमत युद्ध विरोधी था और उसके लिए मन्त्रिमंडल तथा पार्लियामेन्ट को युद्ध के पक्ष में करना कठिन था । वह हर स्थिति में त्रिराष्ट्र मैत्री को कायम रखना चाहता था | 31 जुलाई को फ्रांस के राष्ट्रपति ने अपना एक विशेष दूत सम्राट जार्ज पंचम के पास भेजकर उससे सहायता का अनुरोध किया किन्तु विदेश मंत्री उस समय तक फ्रांस को कोई निश्चित आश्वासन देने की स्थिति में नहीं था ।

इटली की तटस्थता की घोषणा

31 जुलाई को ब्रिटेन के विदेश मंत्री ने फ्रांस और जर्मनी की सरकार के पास एक पत्र भेजा जिसमें दोनों देशों से पूछा गया था कि क्या वे बेल्जियम की तटस्थता को बनाये रखने का वचन देने को तैयार है ? फ्रांस ने तो तुरन्त ही आश्वासन दे दिया, किन्तु जर्मनी इस प्रकार का आश्वासन देने का तैयार नहीं था । वह उसके बदले में ब्रिटेन की तटस्थता का आश्वासन चाहता था, जो इंग्लैण्ड का विदेश मंत्री देने को तैयार नहीं था | 1 अगस्त को फ्रांस ने अपनी सेना को लामबन्दी की आज्ञा दे दी जिससे फ्रांस और जर्मनी के बीच युद्ध अवश्यम्भावी हो गया । 2 अगस्त को जर्मनी ने लक्जेमवर्ग की तटस्थ भूमि पर अधिकार कर लिया और बेल्जियम से 12 घण्टे के अन्दर अपने राज्य में से जमन सेनाओं को मॉस के विरुद्ध आक्रमण करने के लिए मार्ग देने की नाम का। बेल्जियम ने इसे अस्वीकार कर दिया और उसने इंग्लैण्ड से सहायता की अपील की। इंग्लण्ड ने प्रशा तथा अन्य राज्यों के साथ 1839 में बेल्जियम की तटस्थता गारन्टी दे रखी थी। जर्मनी के इस कार्य से अन्तर्राष्ट्रीय कानून के भग हान उससे भी अधिक बेल्जियम पर जर्मनी का अधिकार होने से अपनी सुरक्षा के लिए संकट खड़ा होता देख इंग्लैण्ड ने जर्मनी से बेल्जियम के समक्ष प्रस्तत की गई माँगों को वापस लेने के लिए कहा ।

बेल्जियम की तटस्थता

4 अगस्त अर्धरात्रि तक जर्मनी की ओर से कोई उत्तर न मिलने पर ब्रिटेन ने रात्रि को ही जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। विश्वव्यापी युबका मारम्भ-4 अगस्त, 1914 को ब्रिटेन द्वारा जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में प्रवेश करते ही, यूरोप की सभी बड़ी शक्तियों के बीच युद्ध आरम्भ हो गया था। कुछ ही समय पश्चात् यूरोप और एशिया के कुछ अन्य राज्य भी इसमें सम्मिलित हो गये ।

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