आस्ट्रिया द्वारा बोस्निया-हर्जीगोविना पर अधिकार

आस्ट्रिया द्वारा बोस्निया-हर्जीगोविना पर अधिकार

और अपना पेन्यर नामक युद्ध-पोत अगादियर के बन्दरगाह पर भेज दिया । इससे अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध का खतरा बढ़ गया । इंग्लैण्ड की चेतावनी के कारण जर्मनी को झुकना पड़ा तथा फाँसीसी काँगो का बहुत-सा भाग जर्मनी को देना पड़ा । इस संकट में इंग्लैण्ड द्वारा फ्रांस को समर्थन देने से इंग्लैण्ड और जर्मनी के सम्बन्धों में और अधिक कटुता उत्पन्न हुई। 1908-09 ई० में आस्ट्रिया द्वारा बोस्निया-हर्जीगोविना को अपने साम्राज्य में मिलाने से एक गम्भीर संकट उत्पन्न हो गया । रूस और आस्ट्रिया तथा इटली और आस्ट्रिया के परस्पर सम्बन्ध इसी कारण बिगड़ गए । यद्यपि यह संकट तो टल गया किन्तु वातावरण दूषित हो गया ।

बाल्कन युद्धों से अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण तनावपूर्ण

1912-13 ई० के बाल्कन युद्धों ने भी अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण को अत्यधिक तनावपूर्ण बना दिया था । इन युद्धों के कारण सैन्यवाद और शस्त्रीकरण की दौड़ और तेज हो गई। बल्गारिया सबसे अधिक असन्तुष्ट राज्य था क्योंकि सर्विया, यूनान आदि राज्यों ने उससे बहुत सा भू-भाग छीन लिया था। इन बाल्कन युद्धों के महत्त्व के कारण ही ग्रान्ट एवं टेम्परले ने लिखा है कि-“1914 ई० के महायुद्ध के लिए कोई घटना इतनी उत्तरदायी नहीं जितने कि बाल्कन युद्ध।”

6. विलियम कैसर का चरित्र-

जर्मनी के सम्राट विलियम कैसर का चरित्र भी युद्ध का एक कारण था । वह अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी तथा क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति था। उसकी नीति थी, विश्वप्रभुत्व या सर्वनाश । उसने सम्राट बनने के पश्चात् न और थल सेना का अत्यधिक विकास किया । महायुद्ध के समय उसके पैस भग 18 लाख सैनिक थे। वह अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में किसी से भी कोई समझौता करने के लिए तैयार नहीं था। वह कहा करता था-“परमेश्वर ने हमें संसार को सभ्य बनाने का कार्य सुपुर्द किया है।” इंग्लैण्ड ने उसके सम्मुख मित्रता का प्रस्ताव रखा था, परन्तु उसने अहंकारवश उसको ठुकरा दिया। उसका विचार कि इंग्लैण्ड उसकी सब बातों को मान लेगा और उससे युद्ध नहीं करेगा। वह लोन की तटस्थता की नीति को उसकी कायरता मानता था। ब्रिटिश जनता के परित्र के विषय में उसका भ्रम ही इंग्लैण्ड के प्रति उसके रुख के लिए उत्तरदायी पा और यह भ्रम अन्त में उसके विनाश का कारण बना । इस प्रकार अपने उप तथा साम्राज्यवादी चरित्र द्वारा विलियम द्वितीय ने यूरोप को युद्ध तक पहुँचाने में बहुत सहयोग दिया।

7. सामाजिक असन्तुलन-

जब मनुष्य में स्वार्थ और संकुचित हित की भावना उत्पन्न होने लगती है तो उसमें सद्भावना और प्रेम का अभाव होने लगता है। राष्ट्रीयता की संकुचित भावना, कूटनीति से उत्पन्न मनोमालिन्य, आर्थिक हित चिन्तन के स्वार्थ का प्रचलन इतना अधिक बढ़ गया था कि शान्ति की दुहाई ‘नक्कारखाने में तूती की आवाज सिद्ध हुई । शान्ति और सद्भावना के स्थान पर आशंका, भय और द्वेष की भावना उत्पन्न हुई। ऐसी स्थिति में विभिन्न राष्ट्रों के लिए ठण्डे दिमाग से कुछ भी सोचना कठिन हो गया था। इस समय डार्विन के सिद्धान्त से भी कई लोग प्रभावित थे और वे सामाजिक डार्विनवाद में विश्वास करते थे अर्थात् वे समझते थे कि योग्यतम राष्ट्र ही बचेगा और जति करेगा अथवा यह विश्वास उत्पन्न हुआ कि संघर्ष जीवन का एक प्राकृतिक नियम है और विकास के लिए आवश्यक है ।

सामाजिक डार्विनवाद

विभिन्न राष्ट्रों के लोग अपनी-अपनी संस्कृति को सर्वोत्कृष्ट समझते थे और दलित राष्ट्रों को उन्नत बनाना अपना धार्मिक-कर्तव्य मानते थे। इस कर्त्तव्य की दुहाई के बहाने अन्य जातियों पर अपना प्रभाव स्थापित करने का उपाय नैतिक माना जाने लगा। इस प्रकार भौतिकवाद की प्रगति के साथ धार्मिकता तथा मानवता की भावना शिथिल पड़ती जा रही थी और नरसंहार से अब लोगों की नैतिक भावना को अधिक ठेस नहीपहुँचती थी। उन्हें भौतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए सैनिक बल-प्रयोग में कोई अनौचित्य नजर नहीं आता था। जब सब लोग समझते हो, कि संसार हमारे लिये है, हमें सारी दुनिया पर राज्य करना है, विश्व में अपनी सभ्यता और धर्म का प्रचार करना है, तो वे परस्पर टकराये बिना कैसे रह सकते है, युद्ध से कैसे बच सकते है।

8. समाचार पत्रों एवं प्रचार साधनों का प्रभाव-

किसी भी देश के समाचार-पत्र सदश की विचारधारा का प्रतिनिधित्व अवश्य करते है और जनमत को प्रभावित करने में उनका बड़ा योगदान रहता है। इस समय में सभी देशों के समाचार-पत्रो ने उग्र राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर बहुत सी घटनाओं को इस प्रकार प्रस्तुत किया जिससे कि जनता में उत्तेजना बढ़ी और शान्तिपूर्ण ढंग से समझौता करना कठिन हो गया । जब ब्रिटेन के समाचार पत्रों में जर्मन सम्राट विलिया द्वितीय की नीतियों की आलोचना की गयी तो जर्मनी की जनता इंग्लैण्ड को अपना शत्रु समझने लगी | इसी जर्मन समाचार पत्रों ने भी इंग्लैण्ड की जनता को उकसाया । फ्रांस तथा जर्मनी के सम्बन्ध भी समाचार पत्रों के कारण ही बिगडे। आर्क ड्यूक फ्रांसिस फर्डीनेण्ड की हत्या के पश्चात् सर्दिया और आस्ट्रिया के समाचार पत्रों में एक-दूसरे के विरुद्ध जो कटुतापूर्ण लेख लिखे गये उससे दोनों देशों की जनता में रोष उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था | जून, 1914 में सेन्टपीटर्स वर्ग से प्रकाशित होने वाले बोर्स गजट (Bourse Gazette) में स्पष्ट लिखा था-“रूस तैयार है, फ्रांस को भी तैयार रहना चाहिये ।” इस समाचार को पढ़कर जर्मन सम्राट बहुत क्रोधित हुआ।

उग्र राष्ट्रीयता की भावना

यद्यपि हमें यूरोप के देशों के समाचार पत्रों की स्वतंत्रता, उनके विकास आदि पर काफी सामग्री उपलब्ध होती है, किन्तु वहाँ के समाचार-पत्रों और सरकार से उनके सम्बन्धों के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है । यद्यपि पूर्वी और पश्चिमी यूरोप के देशों के समाचार-पत्रों को इंग्लैण्ड की अपेक्षा कम स्वतन्त्रता थी फिर भी यूरोपीय देशों के समाचार-पत्रों ने युद्ध को भड़काने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। युद्ध की परिस्थितियों को तभी सम्भाला जा सकता था जब प्रेस की स्वतंत्रता पर कोई नियन्त्रण होता । वस्तुतः अनियन्त्रित प्रेस भी प्रथम महायुद्ध का एक महत्त्वपूर्ण कारण था | प्रो. फे ने लिखा भी है कि-‘सरकार के नियन्त्रण के अभाव में समाचार पत्रों के द्वारा सरलता से युद्ध का वातावरण तैयार किया जा सकता है।’

9. अन्तर्राष्ट्रीय संस्था का अभाव-

यूरोप में कोई ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था नहीं थी जो पारस्परिक वार्तालाप के माध्यम से विभिन्न राष्ट्रों के झगड़ों का समाधान करके युद्ध की सम्भावना को टाल देती । यद्यपि अन्तर्राष्ट्रीय कानून और सदाचार की संहिता (Code of International Law and Morality) थी, किन्तु इन्हें लागू करने वाली शक्ति का अभाव था । 1899 और 1907 के हेग सम्मेलनों में अनेक प्रस्ताव स्वीकार हुए पे, किन्तु सभी देश अपनी सुविधाओं के अनुसार ही इनका अनुसरण करते थे।

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