डाक कर्मचारी संघर्ष की राह पर

डाक कर्मचारी संघर्ष की राह पर

6 लाख कर्मचारी 8 जुलाई से देश भर में अनिश्चित हड़ताल पर हैं। डाक कर्मचारियों का राष्ट्रीय फेडरेशन इस हड़ताल को आयोजित कर रहा है।

डाक और रेलवे मेल कर्मचारी देश के अलग अलग भागों में कठिन से कठिन हालातों का सामना करके अलग अलग प्रकार के काम करते हैं। उनमें से सबसें दुखद हालत लगभग 310,000 ग्रामीण डाक कर्मचारियों की है जिन्हें अति विभागीय (एक्सट्रा डिपार्टमेंटल) एजेंट कहा जाता है। ये कर्मचारी दो सदियों से देहाती इलाकों में डाक पहुंचाते हैं।

इन कर्मचारियों को कोई यूनिफार्म नहीं मिलता, उनके पक्के वेतनमान नहीं हैं, उन्हें छुट्टियां, पेंशन या ग्रेच्यूटी नहीं मिलती। यहां तक कि उन्हें यातायात के लिये साईकल या छतरी भी नहीं दी जाती। विभाग के नियमित कर्मचारियों की कोई भी सुविधायें इन्हें नहीं मिलती। परन्तु इनमें उम्मीद की जाती है कि वे लगभग एक लाख ग्रामीण डाक घरों की सेवा करें और पैदल चल कर, कहीं-कहीं अत्यन्त दुर्गम स्थानों में जाकर, करीब 6 लाख गांवों में चिट्ठियां पहुंचायें।

सरकार द्वारा स्थापित जस्टिस तलवार कमेटी की सिफारिशों के अनुसार इन डाक कर्मचारियों को ग्रामीण इलाकों में काम करने के लिये बेहतर वेतनमान और दूसरी सुविधायें मिलनी चाहिये थी, परन्तु ये सिफारिशें लागू नहीं की गई हैं। डाक कर्मचारी इस कमेटी की सिफारिशों को लागू करने और ग्रामीण डाक कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिलाये जाने की मांग कर रहे हैं।

बाकी डाक कर्मचारी भी बेहतर वेतनमान और पांचवे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग करते आये हैं।

डाक कर्मचारियों ने बार बार अपनी मांगे पेश की हैं परन्तु एक के बाद दूसरी, सभी सरकारों ने उनकी हालतांे की ओर पूरी  दासीनता दिखाई। अब उनके पास हड़ताल के अलावा और कोई चारा नहीं रह गया है।

तकनीशियनो की चेतावनी

हरियाणा के प्रयोगशाला तकनीशियनो एसोसियशन ने धमकी दी है यदि सरकार ने समय रहते उनकी मांगो को नहीं माना तो 16 जून को सामूहिक अवकाश लेंगे।

इससे पूर्व एसोसिएशन ने अपने मांगो के समर्थन में पिछले वर्ष धरने देने के उपरांत 21 अप्रेल को रोहतक पीÛजीÛआईÛ में भी धरना दिया। 21 मई को एक दिन का सामूहिक अवकाश लेकर पीÛजीÛआईÛ रोहतक व अन्य अस्तपतालों में काम काज ठप्प कर दिया था और अभी हाल में ही 7 जून को स्वास्थ्य मंत्री के आवास पर धरना दिया लेकिन इस सम्बंध में सरकार सकरात्मक कदम न उठाने के परिणामस्वरूप तकनीशियनो ने आन्दोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।

नर्स आंदोलन जारी

नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन हरियाणा के आह्वान पर विगत् महिने से नर्सों एंव छात्राओं की अनिश्चित हड़ताल जारी हैं।

इसी बीच हरियाणा सरकार के प्रतिनिधियों व हड़ताली नर्सों के प्रतिनिधियों के बीच मांगो को लेकर होने वाली वार्ता फिर टूट गयी। आन्दोलनरत नर्सों ने पूरे राज्य में सरकार का पुतला फंूक कर अपने गुस्से का इजहार किया। प्रदर्शनकारी नर्सों के साथ अन्य मजदूर संघ, सर्वकर्मचारी संघ उनका बराबर साथ दे रहे हैं।

नर्सों ने कहा है कि हरियाणा सरकार आन्दोलन को असफल करने के लिए दमनपूर्ण और ओछी हरकत कर रही है यदि सरकार ऐसे कार्य से बाज न आया तो हम सरकार की ईंट र्से इंट बजा दंेगे तथा सर्वकर्मचारी संघ से सम्बंधित परिवहन निगम “चक्का जाम” या बिजली विभाग “बिजली कट” जैसे कार्य करने पर मजबूर हो सकते हैं जिसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी। दूसरी ओर नर्सें हड़ताल में रहने पर भी मानवीयता के आधार पर मरीजों की देखभाल भी कर रही है।

कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र

प्रस्तुत उद्धरण मंे कार्ल माक्र्स और फ्रेडरिक एंगेल्स यह समझाते हैं कि सर्वहारा इंकलाब इतिहास में पहले हुये इंकलाबों से किस प्रकार भिन्न हैं और उसका लक्ष्य क्या है।

“इससे पहले जो भी वर्ग विजयी होकर आगे आये, उन्होंने अपनी प्राप्त स्थिति को
सुरक्षित करने के लिये पूरे समाज पर अपने विनियोग के हालातों को थोप दिया। सर्वहारा वर्ग अपने वर्तमान विनियोग के तरीकों को खत्म किये बिना और इस प्रकार हर भूतपूर्व विनियोग के तरीके को खत्म किये बिना, समाज की उत्पादक ताकतों का मालिक नहीं बन सकता है। उनके पास सुरक्षित रखने के लिये अपना कुछ नहीं है; उनका लक्ष्य है निजी सम्पत्ति की हर सुरक्षा और हर बीमा को खत्म करना।

“सभी भूतपूर्व ऐतिहासिक आन्दोलन अल्पसंख्यकों के या अल्पसंख्यकों के हित में आन्दोलन थे। सर्वहारा आन्दोलन बहुसंख्या का और बहुसंख्या के हित में जागरूक, आज़ाद आन्दोलन है। सर्वहारा वर्ग, जो वर्तमान समाज का सबसे निचला स्तर है, सरकारी समाज के सम्पूर्ण ऊपरी स्तर को उछाले बिना, खुद हिल नहीं सकता, अपने आप को ऊपर उठा नहीं सकता है।”

दोस्ती के हाथ

हाल ही में, दिल्ली में मशहूर कवि ग़ालिब की 200वीं सालगिरह के अवसर पर आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम “आंदाज़ ए बयान” में पाकिस्तानी कवि अहमद फराज़ और हिन्दोस्तानी कवि अली सरदार जाफ़री ने हमारे दोनों मुल्कों के परम्परागत मैत्री सम्बन्धों पर कवि रचना पेश की। अहमद फराज़ कहते हैंः

गुज़रे हैं मौसम, कई रुतें बदलीं,
उदास तुम भी हो यारों, उदास हम भी हैं
फ़कत तुम्हीं को नही रंजे-चाक-दामनी
सच तो यह है कि दरिदाने-लिबास हम भी हंै
तुम्हें भी ज़िद है कि मश्कें-सितम रहे जारी
हमें भी नाज़ कि जोरों ज़फा के आदि हैं
तुम्हें भी जौम कि महाभारत लड़ी तुमने
हमें भी नाज़ कि कर्बला के आदी हैं
न खिल सके किसी जानिब मुहब्बत के पड़ाव
न शाखे-अमन लिये कोई फ़ाकता आई
तो अब यह हाल है दरिंदगी के साहब
तुम्हारे पांव सलामत रहे न हाथ मेरे
न जीत तुम्हारी न कोई हार मेरी
न साथ तुम्हारे कोई न कोई साथ मेरे
तुम्हारे देश में आया हूं दोस्तों अब के
न साज़ों-नग़मा की महफिल न शायरी के लिये
अगर तुम्हारी अना ही का सवाल है तो
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिये
अली सरदार जाफ़री ने जवाब में कहाः
जो हाथ तुमने बढ़ाया है दोस्ती के लिये
मेरे लिये वह एक ग़म गुसार का हाथ
खुदा करे कि सलामत रहे यह हाथ अपने
अता हुये हैं जो जुल्फें संवारने के लिये
करें अहद के औजारे जंग है जितने
उन्हें मिटाना है और ख़ाक में मिलाना है
करें यह अहद के अरबाबे जंग हैं जितने
उन्हें शराफत-ओ-इन्सानियत सिखाना है
तुम आयों गुलशन-ए-लाहौर से चमन बारदोश
हम आयें सुबह बनारस की रोशनी लेकर
और उसके बाद यह पूछें कि कौन दुश्मन है।

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