निजीकरण की तेज़ गति

निजीकरण की तेज़ गति

वित्त मंत्री श्री, यशवंत सिंहा ने ऐलान किया है कि कई सार्वजनिक क्षेत्रक इकाइयों में सरकारी शेयरों का हिस्सा 26 प्रतिशत तक घटा दिया जायेगा। 1998 में 5000 करोड़ रुपये का विनिवेश किया जायेगा, ऐसा बताया गया है। आईÛओÛसीÛ, जीÛएÛआईÛएलÛ, वीÛएसÛएनÛएलÛ और कानकौर जैसी सार्वजनिक इकाइयों का निजीकरण होगा। इंडियन एयरलाइंस में सरकारी शेयर 50 प्रतिशत से कम कर दिये जायेंगे।

नरसिंह राव की सरकार से शुरू होकर संयुक्त मोर्चा सरकार की अवधि तक कई सार्वजनिक क्षेत्रक इकाइयों का निजीकरण हुआ है। इन कंपनियों के शेयर बड़े औद्योगिक घरानों और वित्त संस्थानों को बेच दिये गये हैं। इस प्रकार बड़े सरमायदारों ने चंद रुपयों के लिये बहुत सारे स्टाक खरीद लिये हैं। विदेशी पूंजीपतियों और कंपनियों को भी स्टाक दिये गये हैं। भाÛजÛपाÛ सरकार भी इसी रास्ते पर चल रही है।

पिछले साल वीÛएसÛएनÛएलÛ ने 1000रु0 प्रति शेयर के दर से 189 लाख शेयर बेच डाले। आईÛओÛसीÛ में सरकारी शेयर 91.3 प्रतिशत से 77.9 प्रतिशत तक घटा दिया जायेगा। श्री सिंहा ने बजट में घाटा पर चल रही सार्वजनिक क्षेत्रक इकाइयों को बंद करने और बड़े पैमाने पर मजदूरों की छंटनी करने का भी प्रबंध किया है। आजकल, जब किसी इकाई को बंद किया जाता हैं तो मजदूरों को उद्योग (विकास और नियंत्रण) अधिनियम के अंतर्गत छंटनी मुआवज़ा मिलती है, जो कि हर साल की सर्विस के लिये 15 दिन का वेतन होता है। अब यह प्रस्ताव रखा गया है कि प्रति साल सार्विस के लिये 45 दिन का वेतन मुआवज़ा के रूप में दिया जायेगा और इस पर एक अधिकतम सीमा लगाई जायेगी। इसके लिये एक अलग पुनर्गठन फंड बनाया जायेगा।

नया बजट किसानों को क्या राहत देगा?

हाल के महीनों में देश के बहुत से इलाकों में किसान खुदकुशी करने को मजबूर हुये हैं और यह सिलसिला आज भी चल रहा है। इस हालत का सामना करने के लिये नये बजट की क्या योजना है? वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि जलसंभर विकास, ग्रामीण बैंक, कपास के लिये प्रोद्योगिकी मिशन, इत्यादि पर ज्यादा पैसा डाला जायेगा, परन्तु ये कदम उन बुनियादी वजहों को छूते भी नहीं हैं जो आज हिन्दोस्तान के किसानों की इस दुर्दशा के लिये जिम्मेदार हैं। यूरिया की कीमत बढ़ा दी गई है, जिससे खेती का खर्चा बढ़ जायेगा, और किसानों को साख पत्र (क्रेडिट कार्ड) देने का प्रस्ताव है, जिनके जरिये वे अपनी जमीन जायदाद को गिरवी रखकर, खेती के लिये जरूरी सामग्रियां खरीद सकेंगे।

आजादी के बाद, छोटे और मध्यम किसानों और उनकें घरानों (यानि देश के 70 प्रतिशत) के साथ बहुत बुरा सलूक किया गया है। बड़े सरमायदारों की सरकार की नीति के अनुसार खेती में तेजी से पूंजीवाद का विकास किया गया है, जिसकी वजह से बहुत से किसान गरीबी में धकेले गये हैं और बेजमीन कर दिये गये हैं। पूंजीवाद का असमान विकास और सामन्ती अवशेषों ने किसानों की जिंदगी को बिल्कुल बिगाड़ दिया है।

हाल मंे, विंध्याचल के दक्षिण इलाके-तेलंगाना, बिदर, विदर्भ इत्यादि में बहुत से किसानों ने खुदकुशी की है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी अब यह सिलसिला शुरु हो गया हैं इन्हीं राज्यों को कभी खेती में पूंजीवाद के विकास की चमत्कारी की मिसाल बतौर बताया गया था और यहां के किसानों को सुन्हरे सपने
दिखाये गये थे कि पूंजीवादी सुधारों से उन्हें क्या कुछ मिल सकता है।

किसान खुदकुशी करने को क्यों मजबूर हुये?

खेती में पूंजीवादी सुधारों के प्रचारकों ने बहुत प्रचार किया कि अगर किसान अनाज उगाने के बजाय नक़दी फसल उगायें तो वे बहुत पैसे कमा सकते हैं। इस प्रचार से धोखा खाकर बहुत से छोटे किसानों ने अनाज उगाना छोड़ कर नक़दी फसल, मसलन तूर दाल और कपास उगाना शुरु कर दिया। परन्तु इन दोनों फसलें खराब हो गईं, उनमें कीडे़ लग गये। इन फसलों की देखभाल करने की जानकारी किसानों को न थी। साथ ही साथ, सरकारी उधार की सुविधायें न होने के कारण किसानों को स्थानीय साहूकारों से पैसे उधार लेने पड़े, कभी कभी 36 प्रतिशत से 400 प्रतिशत ब्याज पर। इन गरीब किसानों के पास न तो आधुनिक खेती की सामग्रियां थीं, और न ही बाजार में बिक्री की आसान सुविधायें ताकि वे नकदी़ फसलों से फायदा उठा सकें। कर्जें की जाल में फंसते-फंसते उनका बेहद बुरा हाल हो गया और खुदकुशी के अलावा उनका और कोई चारा न रहा।

कृषि क्षेत्र में 1980-1990 के बीच सार्वजनिक पूंजी निवेश बहुत घट गया है। राज्य द्वारा यह तर्क पेश किया गया है कि सिंचाई और आधारभूत कृषि संरचनाओं के लिये पैसे नहीं हैं। खेती को निजी पूंजी निवेश के लिये खोल दिया गया हैं, जिससे बड़े पूंजीपति किसानों को फायदा हुआ है। 1990 के दशक में अनाज उत्पादन की बढ़ोतरी की गति बहुत धीमी रही है और 1997-98 में अनाज का उत्पादन लगभग 50 लाख टन कम हुआ हैं। कई इलाकों में अनाज न उगाकर नक़दी फसल उगाये जा रहे हैं और अनाजों में भी सिर्फ चावल और गेहूं ही उगाये जा रहे है, बाजरा, मक्की, ज्वार इत्यादि नहीं, जिसकी वजह से देहातों के लोगों के भोजन पर बुरा असर पड़ा है।

सरकारी उधार की सुविधायें

बैंकों में हाल में जो सुधार किये गये हैं उनमें सार्वजनिक क्षेत्रक बैंकों को मुनाफेदार बनाने पर जोर दिया गया है न कि समाज के कमजोर वर्गों को उधार देने पर। इसलिये अधिकतम किसान सहूकारों के शिकार बन गयें हैं।

इन दुखद हालातों में, बजट में उन कदमों को उठाया जायेगा जिनसे खेती में पूंजीवाद का ही और विकास होगा। कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ाने पर ध्यान दिया जायेगा। उत्पादन, बिक्री और खेत उत्पादों की यातायात में पूंजीवादी किसानों और व्यापारियों को फायदे दिलाने के लिये एक राष्ट्रीय कृषि नीति बनाई जायेगी। कृषि क्षेत्र में निजी पूंजी को आमंत्रण देते हुये वित्त मंत्री ने कहा है कि किसानों को “दुनिया के बाजारों में पहुंचने की सम्भावनाओं से फायदा उठाना चाहिये”।

देश के करोड़ो आम छोटे-मध्यम किसानों की समस्याओं के प्रति यह है हमारे हुक्मरानों की फिक्रमंदी!

 

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