सभी परमाणु ताकतों का पूरा निरस्त्रीकरण हो!

सभी परमाणु ताकतों का पूरा निरस्त्रीकरण हो!

हिन्दोस्तान और पाकिस्तान, दोनों ने अब साबित कर दिया है कि वे परमाणु ताकतें हैं। इसके साथ साथ, शीत युद्ध के बाद से हमारे अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में जो अस्थायी संतुलन बना हुआ था, वह बुरी तरह हिल गया है।

अब तक, पांच बड़ी ताकतों, अमरीका, रूस ब्रिटेन, फ्रंास और चीन का परमाणु हथियारों पर एकाधिकार रहा है। यही पांच देश संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य भी हैं। इन ताकतों ने खूब सारा परमाणु हथियार जमा कर रखा हैं, जिससे दुनिया को कई बार पूरा पूरा नष्ट किया जा सकता है। उन्होंने अपने साम्राज्यवादी हितों को बढ़ावा देने के लिये दूसरे देशों के खिलाफ़ परमाणु और परम्परागत हथियारों का इस्तेमाल करने की धमकी देकर उन्हें ब्लैकमेल करने की कोशिश की है। इन पांचों ताकतों के आपस में होड़ लगती है, परन्तु उन्होंने मिल जुलकर यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि परमाणु हथियारों पर उनके एकाधिकार को किसी और देश से खतरा न हो। न्यूक्लियर नान-प्रालिफरेशन ट्रीटी (एनÛपीÛटीÛ) और काम्प्रिहेनसिव टेस्ट बैन ट्रीटी (सीÛटीÛबीÛटीÛ) अपने इस एकाधिकार को बनाये रखने में उनके साधन हैं। एनÛपीÛटीÛ और सीÛटीÛबीÛटीÛ के जरिये उन्होंने जर्मनी और जापान (दूसरे विश्व युद्ध में पराजित देशों) को अपने परमाणु कलब से बाहर रखा है, हालांकि ये दोनों बड़ी आर्थिक ताकतें बन गई हैं और पिछले कुछ दशकों से अमरीका व दूसरे साम्राज्यवादियों को चुनौती दे रहे हैं। अब हिन्दोस्तान और पाकिस्तान ने इस स्थिति को डगमगा दिया है।

न्यूक्लियर नान-प्रालिफरेशन ट्रीटी (एनÛपीÛटीÛ) और काम्प्रिहेनसिव टेस्ट बैन ट्रीटी (सीÛटीÛबीÛटीÛ)

अमरीका सभी देशों से एनÛपीÛटीÛ और सीÛटीÛबीÛटीÛ पर हस्ताक्षर करवाने की कोशिश में आगे रहा है। जब कि अमरीका आज सबसे खूंखार साम्राज्यवादी ताकत है और सबसे बड़े परमाणु हथियारों के भंडार का मालिक है, तो वह एनÛपीÛटीÛ और टीÛबीÛटीÛ के बारे में इतना चिंतित क्यों है? यह सोचना तो बेवकूफी होगा कि अमरीका शान्ति प्रिय बन गया है। कोरिया, वियतनाम, इंडोचीन, ग्रीस, मध्य अमरीका, क्यूबा, लिबिया, सोमालिया, हाइटी, ईराक – इस सभी मुल्कों के लोगों के तजुर्बे इस बात को नकारते हैं। शीत युद्ध के खत्म होने के बाद अमरीका की दुस्साहस हरकतें और बढ़ गई हैं क्योंकि वह अपने आप को एकमात्र महाशक्ति बनाना चाहता है। आर्थिक तौर पर, जर्मनी, यूरोपीय संघ, जापान और चीन का उसे सामना करना पड़ा रहा है।

इन हालातों में वह अपनी फौजी प्रधानता, खास तौर पर परमाणु प्रधानता के जरिये अपने दुश्मनों तथा किसी नई ताकत की चुनौतियों को टालना चाहता है।

अंतर्राष्ट्रीय स्थिति बहुत ही तनावपूर्ण और खतरनाक है। साम्राज्यवादी ताकतें एशिया और फिर सारी दुनिया पर कब्ज़ा करने के लिये नये नये गठबंधन बना रही हैं। इस सदी के इतिहास ने यह दिखा दिया है कि साम्राज्यवाद दुनिया के बंटवारे के लिये कैसे भयानक युद्ध छेड़ सकता है। दो विश्व युद्ध और उसके बाद बीसियों युद्ध इसके सबूत हैं। एशिया और सारी दूनिया फिर से एक और भयानक जंग की दिशा में बढ़ रही हैं। हिन्दोस्तान के हुक्मरान इस खतरनाक रास्ते पर चल रहे हैं। वे बड़े सरमायदारों और उनके अंतर्राष्ट्रीय मित्रों के खुदगर्ज हितों के लिये हिन्दोस्तानी लोगों को एक और जंग में फंसाने से नहीं हिचकिचायेंगे। हिन्दोस्तान के मजदूरों, किसानों और शान्ति पसंद लोगों को हुक्मरानों के इस रास्ते को ठुकरा देना जाहिये।

सम्पूर्ण निरस्त्रीकरण होना चाहिये!

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने यह मांग की है कि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान एनÛपीÛटीÛ और सीÛटीÛबीÛटीÛ पर हस्ताक्षर कर दें। अगर हिन्दोस्तान वर्तमान रूप में एनÛपीÛटीÛ या सीÛटीÛबीÛटीÛ पर हस्ताक्षर कर देता है तो यह बड़ी ताकतों के सामने घुटने टंेकना होगा। साथ ही साथ, हुक्मरानों में से कुछ लोग यह चाहते हैं कि हिन्दोस्तान इस शर्त पर एनÛपीÛटीÛ पर हस्ताक्षर कर दे कि तब उसे परमाणु कलब का सदस्य बना दिया जायेगा। हमें इन दोनों रास्तों का डटकर विरोध करना चाहिये।

हिन्दोस्तानी लोग दुनिया में व अपने इलाके में शान्ति और सुरक्षा चाहते हैं। वे सभी परमाणु ताकतों, अमरीका, ब्रिटेन, फ्रंास, रूस, चीन, पाकिस्तान व हिन्दोस्तान, का सम्पूर्ण निरस्त्रीकरण चाहते हैं। दुनिया भर के लोग भी यही चाहते हैं।

एनÛपीÛटीÛ या सीÛटीÛबीÛटीÛ पर हस्ताक्षर करने से हिन्दोस्तान और दुनिया भर के लोगों के सामने से युद्ध का खतरा हट नहीं जायेगा। इससे दुुनिया परमाणु विनाश के खतरे से मुक्त नहीं होगी।

हिन्दोस्तान के हुक्मरानों में कुछ लोग हैं जो इस बात से बहुत खुश और उत्तेजित हैं कि अब हिन्दोस्तान को पांच बड़ी परमाणु ताकतों के बराबर माना जायेगा। वे अमरीका की नक़ल करने के सपने देख रहे हैं। उनकी यह सोच हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों की सोच है, जिनके अपने साम्राज्यवादी मंसूबे हैं और जो हमलावर जंग के जरिये दुनिया को फिर से बांटने की हरकत में खुद सक्रिय खिलाड़ी होना चाहते हैं।

अमरीका के साम्राज्यवादी मंसूबे

परन्तु हिन्दोस्तान के मजदूरों, किसानों और मध्यम वर्ग की कुछ और ही आकांक्षायें हैं। हम एक ऐसा हिन्दोस्तान चाहते हैं जहां राज्य सत्ता हमारे अपने हाथों में हो, जहां हम इस सत्ता के जरिये अर्थिक और सामाजिक गैर बराबरी को दूर कर सकें, जहंा हम शान्ति और सुरक्षा से जी सकें। हम एक ऐसा हिन्दोस्तान चाहते हैं जो दुनिया के सामने एक मिसाल होगी, जो अलग-अलग मुल्कांे के बीच नये सम्बन्ध बनायेगा, छोटे मुल्कों को बड़ी ताकतों द्वारा दबाने के सम्बंध नहीं, बल्कि बराबरी और आपसी अमन-चैन और सुख समृद्धि के रिश्ते बनायेगा। हिन्दोस्तानी लोगों के लिये यह अच्छा मौका है कि हम संपूर्ण निरस्त्रीकरण की मांग को आगे रखें, जो कि हिन्दोस्तान और दुनिया के लोगों के हित में होगा।

बजट में आधारभूत संरचना में पूंजी निवेश के लिये कई स्कीम, फंड और तरीके बताये गये हैं, प्राविडेंट फंड के जरिये मध्यम वर्गों की बचत से पैसे लेना, अनिवासी भारतीय पंूजी निवेश बढ़ाना, इत्यादि। बीमा क्षेत्र को हिन्दोस्तानी कंपनियों के लिये खोल देना भी इस नीति का एक हिस्सा है। यानि कि, यह पैसा लोगों से वसूला जायेगा। फिर आधारभूत संरचना को निजी कंपनियों के हाथों सौंप दिया जायेगा, या तो हमेशा के लिये या “बनाओं, चलाओं, हस्तांतर करो” (बीÛओÛटीÛ) के आधार पर। साथ ही साथ, उनके पूंजी निवेश में अगर कोई खतरा आता है तो उसका बोझ भी सरकार, यानि जनता, ही उठायेगी।

निजी कंपनियों के अधिकतम सार्वजनिक खर्च

बजट में खेती और ग्रामीण विकास पर खर्चा बढ़ाने का दिखावा किया गया है। परन्तु इस क्षेत्र में अधिकतम सार्वजनिक खर्चा राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। राज्य सिंचाई, नये पूंजी निवेश तथा मौजूदे नहरों की देखरेख़ के लिये जिम्मेदार हैं। केंन्द्र के पैसे से चलाये जा रहे कार्यक्रम, जिनमंे कुछ खास फसल और खास इलाका सम्बन्धी कार्यक्रम हैं, और भ्रष्टाचार से भरपूर ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम से मेहनतकश किसानों को कोई खास फायदा नहीं होने वाला है जब तक सिंचाई में इतना कम पैसा डाला जायेगा और उसकी देखभाल पर इतना कम ध्यान दिया जायेगा। राज्य सरकारों द्वारा खेती के आधारभूत ढांचे में इतना कम पैसा डाले जाने की समस्या को हल करने के बजाय, भाÛजÛपाÛ का बजट केन्द्र द्वारा राज्यों को दिये गये उधारों में कटौती करेगा, और अगर ऐसा किया गया तो राज्यों को अपना खर्च और कम करना पड़ेगा।

भाÛजÛपाÛ यह दावा करती है कि आम जनता के जीवन स्तर में उन्न्ाति लाने के लिये उसके पास पैसे नहीं हैं, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, शौच प्रबन्ध आदि जैसी बुनियादी मानवीय जरूरतों के लिये पैसे नहीं हैं। इसलिये बजट में इन चीजों के लिये इतना कम पैसा दिया गया है। इसीलिये यह कहा जा रहा है कि भौतिक आधारभूत ढांचे में पूंजी निवेश करने के लिये निजी क्षेत्रक को रियायतें दी जानी चाहियें।

परन्तु हर मजदूर यह जानता है कि सच्चाई कुछ और ही है। हिन्दोस्तान में धन-संसाधनों की कमी नहीं है। समस्या तो यह है कि यह सारा धन बड़े पूंजीपतियों और अमीर किसानों के हाथों में है। अगर जनता पर पूंजी निवेश करना जरूरी है तो सरकार सारा काला धन क्यों नहीं ज़ब्त कर लेती? कर्जे चुकाने के लिये खर्च को कुछ देर के लिये रोका क्यों नहीं जाता? इस समय, सरकारी धन का 25 प्रतिशत हिस्सा सरकार द्वारा अमीरों से लिये गये उधारों के ब्याज चुकाने में खर्च होता है। अगर
एक-दो साल के लिये यह ब्याज न दिया जाये और यह पैसा स्कूल, अस्पताल, सड़क, सिंचाई व बिजली परियोजनाओं पर लगाया जाये तो हालत कितनी बदल सकती है! पर पूंजीपतियों को यह अच्छा नहीं लगेगा। आखिर भाÛजÛपाÛ भी तो कांग्रेस और संयुक्त मोर्चा की तरह, पूंजीपतियों के हितों का संरक्षक है!

भाÛजÛपाÛ से बड़े पूंजीपतियों को तोहफे

Û चुने सार्वजनिक कम्पनियों में सरकारी धनराशि का 74 प्रतिशत तक निजी कंपनियों को बेचा जायगा।

Û इंडियन एयरलाइंस का 50 प्रतिशत बेच दिया जायेगा

Û कोयला और पेट्रोलियम शु़िद्ध में लाइसेंस हटा दिये जायेंगे

Û बीमा को निजी क्षेत्रक के लिये खोल दिया जायेगा

Û शहरी जमीन पर सीलिंग नियम हटा दिया जायेगा (आवास क्षेत्रक में बडे़ निर्माताओं को बढ़ावा देने के लिये )

Û “गैर मुनाफेदार” सार्वजनिक क्षेत्रक कंपनियों को बंद करने के लिये मजदूरों को वेतन पैकेज दिया जायेगा

Û वित्त क्षेत्रक में सुधार के लिये नरसिंहन कमेटी के कुछ सिफारिश लागू किये जायेंगे

Û 10 प्रतिशत प्राविडेंट फंड का पैसा निजी आधारभूत संरचना परियोनाओं में डाला जायेगा

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