कुस्तुन्तुनिया, एड्रियानोपल, जेनिना और स्कुटारी के बीच आपसी मतभेद

Purpose and Functions of Educational Psychology

कुस्तुन्तुनिया, एड्रियानोपल, जेनिना और स्कुटारी के बीच आपसी मतभेद

इस राज्य में सर्व, बल्गर, यूनानी, रुमानियन आदि जातियों के लोग निवास करते थे। प्रत्येक राज्य उसके अधिक से अधिक हिस्से पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता था। इसके अतिरिक्त उनके बीच ऐतिहासिक तथा प्रजातीय कारणों से भी बैमनस्य था। किन्तु इतना होते हुए भी उनको संगठित रखने का एक कारण था -तुकी के प्रति उनकी घृणा । यह घृणा उस समय और तीव्र हो गयी जब ‘युवा तुर्क की तुर्कीकरण की नीति के कारण मेसीडोनिया में हजारों ईसाइयों की हत्या की गई। ती के भीषण अत्याचारों के कारण बाल्कन के राज्यों में पुनः एकता की भावना उत्पन्न होने लगी। 1911 ई० तक बाल्कन राज्य अपने आपसी मतभेदों को भुलाकर मेसीडोनिया को मुक्त कराने के लिए तैयार हो गये ।

तुर्की-इटली संघर्ष

इसी समय तुर्की-इटली संघर्ष में तुर्की को हार के कारण आघात पहुँचा था । अतः इसका लाभ उठाकर 13 मार्च, 1912 को सर्बिया और बल्गारिया के बीच एक सन्धि हो गयी, जिसके अनुसार दोनों राज्यों ने एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता एवं स्वतन्त्रता की गारण्टी दी | इसके अतिरिक्त एक गुप्त समझौता भी हुआ, जिसके अनुसार दोनों राज्यों ने आवश्यकता पड़ने पर रुस की स्वीकृति से, तुर्की के विरुद्ध सम्मिलित आक्रमण करने का निर्णय भी लिया ।

सर्बिया और बल्गेरिया की सन्धि

सर्बिया और बल्गेरिया की सन्धि के बाद 29 मई, 1912 को यूनान और बल्गारिया के बीच एक रक्षात्मक सन्धि हुई। इस सन्धि में मेसीडोनिया के बंटवारे के विषय में कोई उल्लेख नहीं किया गया । सितम्बर, 1912 में दोनों के बीच सैनिक उपसन्धि भी हुई जिसके अनुसार दोनों राज्यों ने, युद्ध के समय समान रूप से सहयोग करने का वचन दिया | मान्टीनीग्रो के साथ कोई लिखित सन्धि नहीं हुई, किन्तु उसने मौखिक रूप से बाल्कन राज्यों के साथ सहयोग करने का वचन दिया था । इस प्रकार अगस्त, 1912 तक बलारिया, सर्विया, यूनान और मान्टीनीग्रो के बीच बाल्कन संघ की स्थापना हुई।

प्रथम बाल्कन युद्ध –

बाल्कन संघ की स्थापना का केवल एक ही उद्देश्य था- तुर्की की निर्बलता से लाभ उठाकर उसे परास्त करना और विजित प्रदेशों को आपस में बोट लेना | बाल्कन के राज्यों में युद्ध की तैयारी आरम्भ हो गयी । यद्यपि फ्रांस के राष्ट्रपति पोइनकारे तथा इस के विदेश मन्त्री साजानोव ने युद्ध को रोकने का प्रयल किया, किन्तु उनके प्रयत्नों का कोई परिणाम नहीं निकला । बल्गारिया, सर्बिया और यूनान की निगाहें मेसीडोनिया पर लगी हुई थी तथा इन तीनों राज्यों के क्रान्तिकारी लोग मेसीडोनिया में अव्यवस्था फैला रहे थे। तुकी के सुल्तान ने विद्रोहों को दबाने के लिए क्रान्तिकारियों पर अत्याचार किये, इससे बाल्कन के राज्यों में उत्तेजना फैल गयी । यूरोप के बड़े राज्य युद्ध को रोकने की योजना पर विचार कर ही रहे थे कि 8 अक्टूबर, 1912 को मान्टीनीग्रो ने तुकी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी ।

तुर्की को अल्टीमेटम

14 अक्टूबर, 1812 को बलगारिया, सर्बिया और यूनान के तुर्की को अल्टीमेटम दे दिया | 18 अक्टूबर को तुकीने बल्गारिया और सर्बिया विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी और उसी दिन यूनान ने भी तुकी के विरुद्ध आरम्भ कर दिया- यह प्रथम बाल्कन युद्ध था । इस युद्ध का पहला दौर अक्टक 1912 से दिसम्बर, 1912 तक चला | तुर्की साम्राज्य पर चारों ओर से आक्रम किया गया । बल्गारिया की सेनाएँ प्रेस (Thrace) में प्रवेश कर गई और उन किर्क-किलिसे (Kirk-Kilisse) के युद्ध में विजय प्राप्त हुई। इसके बाद बल्लारिय की सेनाएँ एक सप्ताह के कठिन युद्ध के पश्चात् एड्रियानोपल तक पहुंच गयी। अब तुकों को भाग कर अपनी राजधानी में शरण लेनी पड़ी।

कोसोवो (Kossovo) की पराजय

दूसरी ओर सर्बिया की सेनाएँ नोवी बाजार में प्रवेश कर गी। उन्होंने तुर्की को कमोनोव (Kumonov) की लड़ाई में हराया और इस प्रकार 1389 की प्रसिद्ध कोसोवो (Kossovo) की पराजय का बदला ले लिया। उन्होंने अस्कन नामद प्राचीन सर्बिया की राजधानी पर अधिकार कर लिया। नवम्बर में सर्बिया की सेनाओं ने एड्रियाटिक सागर के दुराजो (Durazzo) नामक बन्दरगाह पर अधिकार कर लिया । उधर मान्टीनीग्रो की सेनाओं ने भी अल्बानिया पर आक्रमण किया। यूनानियों ने येसली पर आक्रमण किया और वे सैलोनिका में प्रवेश कर गये। यूनान ने तुर्की के बन्दरगाहों के मागों को अवरुद्ध कर दिया । 16 दिसम्बर, 1912 में यूरोपीय शक्तियों ने युद्ध में सम्मिलित राष्ट्रों का सम्मेलन लन्दन में बुलाया और युद्धरत राष्ट्रों को एक अस्थायी सन्धि स्वीकार करने को बाध्य किया। चारों राज्यों ने तुर्की को बुरी तरह पराजित किया था |

अब तुर्की के पास यूरोप में केवल कुस्तुन्तुनिया, एड्रियानोपल, जेनिना और स्कुटारी के राज्य ही बचे थे । लन्दन की सन्धि में तुर्की ओर बाल्कन राज्यों के बीच समझौते की बात की गई। दो मुख विषयों पर दोनों पक्षों में भारी मतभेद था | क्या रुमानिया को अपनी तटस्थता के बदले दौQजा क्षेत्र में कुछ लाभपूर्ण रियासतें मिलनी चाहिये ? क्या तुर्की के अधिकार में ये चारों नगर बने रहें जिन पर अभी तक तुर्की का अधिकार या! जनवरी, 1913 में प्रथम प्रश्न का रुमानिया के पक्ष में निर्णय हो गया: दूसरे प्रक के सम्बन्ध में यह निर्णय हुआ कि तुर्की से एड्रियानोपल से लिया जाय और केर। तीनों नगरों पर तुर्की का ही अधिकार माना जावे।

किन्तु तुर्की के अधिकार से एड्रियानोपल के निकल जाने से युवा तुर्को । असन्तोष छा गया | 23 जनवरी, 1913 को युवा तुर्कों के नेता अनवर ने दुक के प्रधानमन्त्री कियामिल पाशा को त्यागपत्र देने के लिए बाध्य किया। 29 जनवरी, 1913 को बाल्कन के राज्यों ने भी युद्ध विराम समाप्त कर दिया और तुर्की के विरुद्ध पुनः युद्ध आरम्भ कर दिया। यह प्रथम बाल्कन युद्ध का दूसरादा था । 4 फरवरी को बल्गारिया ने एड्रियानोपल पर पुनः अधिकार कर लिया 26 मार्च को एड्रियानोपल का भी पतन हो गया । इसके बाद तुर्की के पास केवल कान्सटेन्टीनोपल और स्कुटारी बचे थे, अतः उसे पुनः समझौते की वार्ता आरम्भ करने के लिए विवश होना पड़ा।

लन्दन की सन्धि –

अप्रैल, 1913 के मध्य में तुर्की और बल्गारिया ने युद्ध विराम स्वीकार कर लिया और लन्दन में सन्धिवार्ता पुनः आरम्भ हो गयी । सम्मेलन ने स्कटारी का किला अल्बानिया के नवनिर्मित राज्य को देने का निर्णय किया , किन्तु मान्टीनीग्रो ने बड़े राज्यों के निर्णय की अवहेलना कर के स्कुटारी पर आक्रमण कर 23 अप्रेल को उस पर अधिकार कर लिया । अन्त में आस्ट्रिया द्वारा शक्ति प्रयोग की धमकी देने पर मान्टीनीग्रो स्कुटारी छोड़ने के लिए तैयार हुआ | सर्बिया ने
राजो पर अपना अधिकार छोड़ दिया। इसके पश्चात् अन्य सभी समस्याओं पर समझौता हो गया ।

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