कृषि क्षेत्र में उधारों की असली स्थिति

कृषि क्षेत्र में उधारों की असली स्थिति

भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार गरीब किसानों (यानि जिनकी पूरी जायदाद 1000 रुपये से कम है) के 94 प्रतिशत उधार साहूकारों से लिये जाते हैं। विकास के लिये बैंकों द्वारा दिये गये उधार का सिर्फ 17 प्रतिशत खेती के लिये दिया जाता है। कृषि मंत्रालय द्वारा पंजाब और हरियाणा में किसानों के कर्जों की जांच करने के लिये बिठाई गई एक उच्च स्तरीय कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार बैंक और वित्त संस्थान टेªक्टर, पंपसेट आदि के लिये लंबे समय के उधार देने को तैयार हैं, जिनसे सिर्फ उन थोड़े पूंजीवादी किसानों को फायदा होता है जो ये कर्जे चुका सकते हैं। छोटे और मध्यम किसान साहूकारों पर निर्भर हैं। पंजाब में जहां किसानों को 1996-97 में लगभग 4000 करोड़ रुपये के उधार की जरूरत थी, वहां सरकारी उधार संस्थानों से सिर्फ 1500 करोड़ रुपये उधार मिले थे, यानि 62 प्रतिशत कम।

कमल खिल रहा है़, मगर बड़े पूंजीपतियों के लिये

वाजपयी सरकार की पहली बजट से यह साफ है कि दूसरी अमीरों की पार्टियों की तरह, वह भी बड़े उद्योगपतियों और अमीर किसानों के मंसूबों को पूरा करने वाली है।

बजट का महत्व इस बात में कि यह अर्थव्यवस्था की दिशा पर सरकार की नीति को स्पष्ट करता है।

हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है, जिसमें आम लोगों की जमीन और श्रम का बेरहम शोषण करके घरेलू व विदेशी सरमायदारों के लिये अधिकतम मुनाफे़ सुनिश्चित किये जाते हैं। यह साफ़ है कि भाÛजÛपाÛ अर्थव्यवस्था की इस दिशा से सहमत है और इसे बदलने का उसका कोई इरादा नहीं हैं।

आजकल पूर्वी एशिया के वित्त संकट के बाद, दुनिया की अर्थव्यवस्था बहुत ही डांवाडोल स्थिति में है। हिन्दोस्तान में पूंजीवादी विकास की गति धीमी हो गई है, जिससे समाज के विभिन्न वर्गों में काफ़ी चिंता फैल गई है। बड़े सरमायदारों की यह शिकायत है कि मनमोहन सिंह और पीÛ चिदम्बरम की आर्थिक नीतियां ज्यादा हद तक विदेशी पंूजी के
पक्ष में थी। छोटे और मध्यम उद्योगपति व किसान कर्ज सुविधाओं की कमी और ऊंचे ब्याज दर की शिकायत कर रहे हैं। उन सब की यह उम्मीद थी कि भाÛजÛपाÛ सरकार उनकी मदद करेगी।

1 जून को बजट पेश करते हुये वित्त मंत्री श्री यशवंत सिंहा ने उसे एक “स्वदेशी बजट” बताया। इस आधार पर उन्होंने यह उचित ठहराया कि बहुत सी चीजों के आयात पर 8 फीसदी और कस्टम ड्यूटी लगाई जायेगी। यह उन हिन्दोस्तानी कंपनियों के हित में होगा जिन्हें आयातों की वजह से विदेशी कंपनियों का मुकाबला करना पड़ रहा था। इस प्रकार, भाÛजÛपाÛ की “स्वदेशी” आर्थिक नीति आयातों को और महंगा बनाकर, हिन्दोस्तान के बड़े उद्योगपतियों की मदद करेगी।

इसके अलावा, सिंहा जी ने कई और कदम उठाने का ऐलान किया है, जिनसे स्वदेशी और विदेशी पंूजीवादी इजारेदारों को फायदा होगा। ये बजट में “सुधार कदम” बताये जा रहे हैं।

अगर हिन्दोस्तान को दुनिया के दूसरे उन्नत देशों का जैसा, अच्छी व निरंतर बिजली सप्लाई, यातायात व संचार साधन दिलाना है तो बेशक इसमें बहुत पंूजी डालनी पड़ेगी। पर सवाल यह है कि इस आधारभूत संरचना के लिये कौन जिम्मेदार है और इसकी कीमत किससे अदा की जायेगी ?

बीमा क्षेत्रक का निजीकरण

लोगों की सुरक्षा-मुनाफा के स्त्रोत

इस साल के बजट में घोषित बीमा क्षेत्रक का निजीकरण मेहनतकशों के हकों पर एक और हमला है। हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार और विदेश की बहुराष्ट्रिक कंपनिया बार बार बीमा क्षेत्रक के निजीकरण की मांग करते आ रही हैं। पिछले दिसम्बर में अमरीकी व्यापार सचिव ने यह मांग रखी। पिछले साल अगस्त में बीमा पर दूसरी अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठी में कानफेडरेशन आफ इंडियन इंडस्ट्री ( सीÛआईÛआईÛ-हिन्दोस्तान के बड़े उद्योगपतियों का दल) ने दुनिया भर से लगभग 400 कंपनियों व सलाहकारों को इकट्ठा किया था, जो कि हिन्दोस्तान के बीमा क्षेत्रक में घुसना चाहते थे। पहले उम्मीद थी कि सिर्फ स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र में ही निजीकरण होगा, फिर दूसरे क्षेत्रों मंे। परन्तु अब वित्त मंत्री ने सरमायदारों को खुश करने के लिये सभी बीमा क्षेत्रों में निजीकरण की इज़ाज़त दे दी है।

ऐसा कहा जा रहा है कि सरकार की “स्वदेशी” नीति के अनुसार सिर्फ हिन्दोस्तान के सरमायदारों को ही इस क्षेत्र मंे पूंजी निवेश करने की इज़ाज़त दी जायेगी। यह एक बड़ा झूठ हैै। कोई भी हिन्दोस्तानी कम्पनी किसी विदेशी बहुराष्ट्रिक कंपनी को अपना सांझेदार बनाकर इस मुनाफेदार क्षेत्रक में विदेशी बहुराष्ट्रिक कंपनियों को घुसा सकता है।

सरकार की “स्वदेशी” नीति

कई बहुराष्ट्रिक कंपनियोें ने बीमा क्षेत्र के निजीकरण के कदम का गुणगान करना शुरू कर दिया है। आधारभूत संरचना उद्योग में हिन्दोस्तानी और विदेशी बहुराष्ट्रिक कंपनियों को इस कदम से फायदा होगा।

हमारे जैसे समाज में जहां जीवन, रोजी रोटी, शिक्षा, आवास, इत्यादि जैसे बुनियादी मानव अधिकारों को सुनिश्चित नहीं किया जाता है, वहां बीमा कंपनियां लाखों लाखों बीमा धारकों से प्रीमियम इकट्ठा करती हैं। उसका थोड़ा सा हिस्सा दुर्घटनाओं, बाढ़, चोरी, आदि से पीड़ित लोगों के दावों को पूरा करने में इस्तेमाल होता है, क्योंकि आम जनता का बहुत छोटा सा हिस्सा ही जीवन की आम असुरक्षाओं से बीमा द्वारा सुरक्षित हैं। बीमा व्यवस्था, जिसमें लोग अनजान दुर्घटनाओं के लिये पहले से ही पैसे देते हैं, असलियत में राज्य के लिये एक साधन है, जिससे वह लोगों के हकों व खुशहाली की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है, और बड़े सरमायदारों को सस्ते उधार दे सकता है।

बीमा क्षेत्रक का निजीकरण होने से इन पैसों को किस काम में इस्तेमाल कया जायेगा, इस पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा। फिर हिन्दोस्तानी और विदेशी बहुराष्ट्रिक कंपनियां मुनाफेदार उद्योगों, सट्टाबाज़ी इत्यादि में यह पैसा लगा सकेंगे।

 

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