प्रथम विश्व युद्ध के लिए उत्तरदाई कारण

प्रथम विश्व युद्ध के लिए उत्तरदाई कारण

विभिन्न देशों के बीच पारस्परिक शंका और ईया बढ़ती जा रही थी, अतः यूरोप के सभी देश अपनी सैनिक शक्ति में वृद्धि कर रहे थे। इस सम्बन्ध में प्रोफेसर फे ने लिखा है कि-“सैन्यवाद के अन्तर्गत दो तथ्य निहित है प्रथम विशाल सेनाओं तथा नौ-सेनाओं की भयानक एवं बोझिल व्यवस्था तथा परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाला सन्देह, भय एवं घृणा का वातावरण; दूसरा यह कि जनरल स्टाफ की अध्यक्षता में सैनिक एवं नौ-सैनिक अधिकारियों का सक्तिशाली वर्ग, जो किसी भी राजनैतिक संकट के समय नागरिक प्रशासन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न करता है।” इस सम्बन्ध में प्रोफेसर लेंगसेम ने भी लिखा है कि “सैन्यवादी राज्य वह है जिसमें सैनिक शक्ति सिविल शासन के ऊपर हावी हो जाती है।”

जर्मनी द्वारा अपनी नौ-सैनिक शक्ति को बढ़ाना

जब जर्मनी ने अपनी नौ-सैनिक शक्ति को बढ़ाना आरम्म किया तो यह कार्य इंग्लैण्ड की नाविक शक्ति के लिए एक चुनौती समझा जाने लगा | इसके परिणामस्वरूप नाविक प्रतिस्पर्धा बढ़ गयी । इस प्रतिस्पर्धा ने यूरोप के अन्य देशों को भी प्रभावित किया । प्रत्येक देश अपनी सैन्यवृद्धि को ही राष्ट्रीय प्रतिष्ठा समझ बैठा और सैनिक शक्ति में वृद्धि करने लगा । 1914 ई० तक जर्मनी के पास आठ लाख पचास हजार सैनिक थे। इसके अतिरिक्त उसके पास पचास लाख प्रशिक्षित व्यक्ति ये जो युद्ध के समय मोर्चे पर भेजे जा सकते थे । फ्रांस ने भी अधिक से अधिक लोगों को युद्ध के लिए तैयार किया । रूस के पास भी शान्ति के समय पन्द्रह लाख सैनिक थे । इन देशों ने न केवल सैनिकों की संख्या में बढ़ोतरी की अपितु आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों का भी विकास किया । यद्यपि यह सब सैनिक तैयारी सुरक्षा की दृष्टि से की गयी, किन्तु उसके कारण विभिन्न राज्यों में सैनिक शक्ति बढ़ाने की प्रतिद्वन्दिता आरम्भ हो गयी जिससे सर्वत्र भय, आशंका एवं पारस्परिक घृणा का वातावरण बन गया।

सैन्यवाद का प्रभाव

यूरोप के देशों में सैन्यवाद का प्रभाव बढ़ने से उनकी आन्तरिक और विदेश नौति भी प्रभावित हुई । सैन्यवाद ने कुछ बड़े देशों की मानसिकता को ही बदल दिया । अब लोगों को यह विश्वास हो गया था कि अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का हल सैनिक शक्ति के आधार पर ही किया जा सकता है । यद्यपि रूस के जार निकोलस द्वितीय ने शस्त्रीकरण पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिबन्ध लगाने के लिए हेग में सम्मेलन आमन्त्रित किये थे, किन्तु जर्मनी के विरोध के कारण शस्त्रीकरण को सीमित करन की योजना असफल सिद्ध हुई।

इस प्रकार सैन्यवाद और स्त्रीकरण के फलस्वरूप, यूरोप के बड़े राज्य दा परस्पर विरोधी और पूर्ण रूप से सुसज्जित युद्ध शिविरों में विभाजित हो चुके थे। यड आरम्भ करने के लिये केवल एक चिनगारी की आवश्यकता थी।

4. साम्राज्यवाद तथा आर्थिक प्रतिवन्दिता-

बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से संसार में दो प्रकार की प्रगति हुई थी । एक तो, जिन देशों के पास धन था और जिनका औद्योगीकरण तीव्र गति से हुआ था उनमें अधिक धन कमाने और अपने तैयार माल को बेचने के लिए बाजार प्राप्त करने की इच्छा रहती थी । ऐसे देशों में इंग्लैण्ड, अमेरिका तथा जर्मनी प्रमुख थे । ऐसे देशों में आर्थिक प्रतिद्वन्द्विता साम्राज्यवाद से संलग्न थी । ये देश अपना औपनिवेशिक विस्तार, आर्थिक आवश्यकता के कारण करना चाहते थे । दूसरी प्रगति उन देशों की थी, जो अभी कृषि तथा उद्योग के सन्तुलन की स्थिति से गुजर रहे थे । ऐसे देशों में फ्रांस तथा इटली थे । ये देश एशिया, अफ्रीका तथा पूर्वी यूरोप के देशों पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहते थे, क्योंकि इन स्थानों में अभी औद्योगिक प्रगति नहीं हुई थी। स्वभावतः नये देशों को अधिकार में करने की भूख और अपने विशेष धन और उत्पादन की खपत करने की अभिलाषा से औपनिवेशिक संघर्ष उत्पन्न हुआ था । यही कारण है कि प्रो. लेंगसम ने साम्राज्यवाद और आर्थिक प्रतिद्वन्द्विता को भी विश्व युद्ध का एक महत्त्वपूर्ण कारण माना है ।

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक अफ्रीका का अधिकांश भाग यूरोपीय राज्यों में विभाजित हो चुका था। इसमें सबसे अधिक हिस्सा इंग्लैण्ड तथा फ्रांस को प्राप्त हुआ। जर्मनी औपनिवेशिक दौड़ में विलम्ब से पहुँचा, अतः उसको अपेक्षाकृत सीमित क्षेत्र ही प्राप्त हो एका, जिससे वह असन्तुष्ट रहा । यद्यपि अफ्रीका के बंटवारे के लिए कोई युद्ध नहीं लड़ना पड़ा था, किन्तु उसके कारण यूरोपीय राज्यों में पारस्परिक तनाव में वृद्धि अवश्य हुई । बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में जर्मनी तथा इंग्लैण्ड की व्यापारिक प्रतिद्वन्द्विता इतनी बढ़ गयी थी कि दोनों देशों के उद्योगपति और राजनीतिज्ञ एक दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयत्न करने लगे । बाल्कन क्षेत्र में रूस तथा आस्ट्रिया के परस्पर विरोधी आर्थिक हितों के कारण ही वहाँ संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई । सुदूर पूर्व और चीन में आर्थिक और राजनीतिक साम्राज्यवाद के प्रसार के लिए यूरोपीय शक्तियों ने जो ‘बन्दर बाँट की, इसने उनके बीच निर्णायक संघर्ष की संभावना को और अधिक बढ़ा दिया । इस प्रकार पूरोपीय राज्यों की साम्राज्यवादी एवं व्यापारिक महत्त्वाकांक्षाओं के कारण एक-दूसरे के प्रति घृणा और अविश्वास का वातावरण बना जिससे संघर्ष आवश्यक हो गया।

5. अन्तर्राष्ट्रीय अराजकता (International Anarchy)-

बीसवीं शताब्दी के प्रथम शक में ही यूरोप में अशान्ति एवं अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो चुकी थी। शक्तिशाली देश छोटे-छोटे राज्यों को बाँट कर अपने स्वार्यों की पूर्ति करने में लग
41 1900 ई. के पश्चात् ऐसी अनेक घटनाएँ घटित हुई जिनके कारण अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण तनावपूर्ण बना रहा ।

रूस-जापान युद्ध (1904-05 ई०)

रूस-जापान युद्ध (1904-05 ई०) ने भी यूरोपीय राजनीति को प्रभावित किया। रूस की पराजय के कारण उसकी दुर्बलता से लाभ उठाने के लिए जर्मनी । मोरक्को में फ्रांस को चुनौती दी और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में गम्भीर स्थिति उत्पन कर दी । इसके अतिरिक्त जब रूस को सुदूरपूर्व में साम्राज्य-विस्तार का अवसर नहीं मिला तो उसने बाल्कन-प्रदेशों में अनुचित हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया। इससे बाल्कन की राजनीति और अधिक जटिल हो गयी।

विलियम कैसर तथा उसका चान्सलर बूलो मोरक्को में फ्रांस के बढ़ते हुए प्रभाव से भयभीत थे । वे फ्रांस पर प्रतिबन्ध लगाना चाहते थे। विलियम ने टेन्जियर जाकर यह माँग की कि मोरक्को की समस्या पर विचार करने के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया जाय | उसके दबाव के कारण 1906 ई. में अल्जीसिरास सम्मेलन आयोजित किया गया, लेकिन इस सम्मेलन से भी जर्मनी सन्तुष्ट नहीं था । इस सम्मेलन में इंग्लैण्ड ने फ्रांस को पूर्ण समर्थन दिया।

1911 ई० में फेज के विद्रोह को दबाने के लिए तथा यूरोपियन लोगों के जन-जीवन की रक्षा करने के लिए फ्रांस ने वहाँ अपनी सेना भेज दी तो इस पर जर्मनी ने इसका विरोध किया

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