फ्रांस, आस्ट्रिया और रूस के समझौते से जापान पर प्रभाव

फ्रांस, आस्ट्रिया और रूस के समझौते से जापान पर प्रभाव

कुछ ही दिनों में तुर्की की सेना ने कर दी लगभग 25 गाँवों को नष्ट कर दिया तथा लगभग 20 हजार आर्मीनियनों की हत्या जब यूरोप के लोगों को तुर्की के इस अत्याचार के समाचार मिले तो यूरोपीय जनमत आर्मेनियनों की सहायता की मांग करने लगा । ब्रिटिश प्रधानमंत्री लाई सेलिसबरी आर्मेनियनों की रक्षा के लिए सशस्त्र हस्तक्षेप करना चाहता था, किन्तु रूस और फ्रांस ने उसका साथ नहीं दिया । तुकी के सुल्तान ने इंग्लैण्ड के विरोध की कोई परवाह नहीं की । इस प्रकार यूरोपीय राज्यों की आपसी फूट के कारण हजारों आर्मेनियनों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी।

कीट की समस्या –

18961 में कीट ने तुकी शासन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था । कीट को कुछ समय के लिए यूनान की सहायता प्राप्त हुई थी किन्तु यूनान का वास्तविक उद्देश्य कीट को हड़प लेना था । यूनान के लोग कीट को यूनान का महादीप’ कहते थे । कीट के अधिकांश निवासी यूनानी थे तथा उनमें तुर्की साम्राज्य से मुक्त होने की भावना प्रबल थी। अतः 17 अप्रैल, 1897 को तुर्की ने यूनान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। यूरोपीय शक्तियों के विरोध के कारण 19 अप्रेल, 1897 को युद्ध विराम की घोषणा करनी पड़ी। ब्रिटिश प्रधानमंत्री सेलिसबरी ने रुस, फ्रांस और इटली के सहयोग से सन्धि की शर्ते निश्चित की तथा तुर्की के सुल्तान को इसे मानने के लिए बाध्य किया ।

कुस्तुन्तुनिया में सन्धि

4 सितम्बर, 1897 को कुस्तुन्तुनिया में सन्धि पर हस्ताक्षर किये गये । इस सन्धि के अनुसार यूनान ने तुर्की को 40 लाख रुपये युद्ध का हर्जाना देने का वचन दिया तथा थेसली राज्य का कुछ भाग पुनः तुर्की को देना पड़ा । अब क्रीट को आन्तरिक स्वशासन प्राप्त हो गया किन्तु उसकी यूनान के साथ सम्मिलित होने की इच्छा पूर्ण न हो सकी। ‘तरुण तुर्क’ आन्दोलन – 1908 ई० में तुर्की में एक क्रान्ति हुई जिसमें ‘तरुण तुर्क नामक दल ने सुल्तान से संविधान की माँग की | चूँकि क्रांतिकारियों को सेना का समर्थन प्राप्त था, अतः सुल्तान अब्दुल हमीद को झुकना पड़ा और 1876 ई० के संविधान को पुनः लागू करने की घोषणा करनी पड़ी तथा संसद का अधिवेशन बुलाना पड़ा ।

राजनीतिक स्वाधीनता

यूरोप के बहुत से भागों में इन घटनाओं को निराशा की दृष्टि से देखा गया । यूरोपीय शक्तियों को भय था कि नवीन लोकतंत्रात्मक तुर्की, जो राजनीतिक स्वाधीनता और धार्मिक सहिष्णुता का उपभोग करेगा, उन प्रान्तों को भी फिर से हथियाने की कोशिश कर सकता है जो तुर्की के हाथ से निकल गये है और जिन पर सुल्तान का केवल नाममात्र का शासन है । तुर्की में 1909 ई० में तरुण तुर्कों के विरुद्ध एक प्रतिक्रांति हुई लेकिन वह सफल नहीं हो सकी । तरुण तुर्क दल के नेताओं का विचार था कि यह प्रतिक्रांति अब्दुल हमीद ने करवाई है। और वह फिर से स्वेच्छाचारी शासन स्थापित करना चाहता है । अतः उन्होंने उसको अपदस्थ कर दिया और उसके भाई मोहम्मद पंचम को सिंहासन पर बैठाया।

मास्ट्रिया द्वारा बोस्निया तथा डंगोविना पर अधिकार –

बर्लिन की सन्धि के द्वारा आस्ट्रिया को बोस्निया व हींगोविना के प्रशासकीय अधिकार प्रदान किये गये ये किन्तु आस्ट्रिया इन प्रदेशों को स्थायी रूप से हड़पना चाहता था । आस्ट्रिया तरुण तुक की कार्यवाही देख चुका था । वह नहीं चाहता था कि बोस्निया तथा हजागोविना पर इस बात का प्रभाव पड़े, अतः 6 अक्टूबर, 1908 को ही आस्ट्रिया सम्राट ने बोस्निया तथा हर्जीगोविना पर आस्ट्रिया के आधिपत्य की घोषणा कर दी | इस घोषणा की यूरोप के बड़े राज्यों में बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया हुई जिस बाल्कन क्षेत्र में एक नया संकट उत्पन्न हो गया। इंग्लैण्ड ने आस्ट्रिया के इस का को अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था का उल्लंघन मान कर उसकी आलोचना की । बोस्निया अघिहनन की सबसे अधिक प्रतिक्रिया सर्बिया और मान्टीनोग्रो में हुई। सर्बिया, विदेश मन्त्री मिलोवानोविच ने कहा था- “मेरे देश को इससे शारीरिक कष्ट समान आघात लगा है जिससे जनता की आत्मा कराह उठी है। मान्टीनीग्रो भी आस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की तैयारी आरम्भ कर दी किन्तु आस्ट्रिया यह कार्य बर्लिन की सन्धि के प्रतिकूल था ।

बोस्निया और हीगोविना पर विजय

अत: कुछ समय के लिए तो यूरोपीय युद्ध की सम्भावना दिखाई देने लगी । सब लोगों को आशा थी कि बोस्निया और हीगोविना के उनके देशवासी एक दिन उनके साथ अवश्य मिलेंगे लेकिन आस्ट्रिया ने इन प्रान्तों पर अपना अधिकार करके उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया । रूस का प्रोत्साहन मिलने पर सर्बिया ने इस बात का विरोध किया । लेकिन जर्मन सरकार ने घोषणा की कि यदि आस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध में रूस ने सर्बिया की सहायता की तो जर्मनी भी आस्ट्रिया की सहायता करेगा रूस झुक गया और इस प्रकार यह संकट टला। इटली-तुर्की युद्ध – तुर्की के कमजोर साम्राज्य पर इटली की निगाहें भी टिकी हुई थी । वह अफ्रीका में अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहता था। उसकी निगाहें ट्रिपोली के राज्य पर थी। 1878 ई० में ही उसने ट्रिपोली पर अधिकार करने की बात कही थी ।

तुर्की के विरुद्ध युद्ध की घोषणा

वह फ्रांस, आस्ट्रिया और रूस से इसके लिए समझौते भी कर चुका था । अगादियर संकट के कारण उत्पन्न परिस्थितियों से लाभ उठा कर इटली ने ट्रिपोली पर अधिकार करने के उद्देश्य से सितम्बर, 1911 में तुर्की के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी । कुछ ही समय में उसने ट्रिपोली के तटवर्ती भाग, रोड्स द्वीप और डोडेकनीज द्वीप समूह पर अधिकार कर लिया । निर्बल तुर्की को 1912 ई० में लासेन सन्धि के द्वारा ट्रिपोली पर इटली का अधिकार स्वीकार करना पड़ा। इस युद्ध से तुर्की की निर्बलता प्रकट हो गयी और बाल्कन राज्यों को उसके विरुद्ध संगठित होने की प्रेरणा मिली । प्रोफेसर के (Fay के मतानुसार ट्रिपोली के युद्ध के कारण ही बाल्कन संघ की स्थापना हुई

बाल्कन राज्यों का संघ –

बर्लिन की सन्धि के पश्चात् ही बाल्कन के राज्यों ने तुको के विरुद्ध संगठित होने का प्रयास किया था; किन्तु 1885 ई० में बल्गारिया के विस्तार तथा उसके बाद सर्विया-बल्गेरिया युद्ध के कारण बाल्कन राज्यों के संगठित होने की सम्भावनाएँ समाप्त हो गयी थी। 1891 ई० में यूनान के प्रधानमन्त्री ट्रिकूपीस ने सर्विया और बल्गारिया से वार्ता आरम्भ की । सविया सहयोग के लिए तैयार था किन्तु बल्गेरिया के सम्बन्ध जर्मनी तथा आस्ट्रिया से और उनके द्वारा तुकी से भी अच्छे थे, अतः उसने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया किन्तु बाल्कन राज्यों में असहयोग का मूल कारण मेसोडोनिया का राज्य था।

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