मौत के खेत

मौत के खेत

महाराष्ट्र: अमरावती और यवतमाल

मृत्यु संख्या: 22

नक़दी फसल: कपास

वजह: तेज़ ओले पड़ने से और असमय वर्षा से फसल खराब हो गई। किसानों ने कीटनाशक खरीदने के लिये बैंको और साहूकारों से भारी कर्जे लिये थे।

कर्नाटक: बिदर, गुलबर्गा, रायचुर

मृत्यु संख्या: 14

नक़दी फसल: तूर दाल और दूसरी दालें

वजह: सूखा पड़ने से और कीटों से 80 प्रतिशत फसल खराब हो गई। दिसम्बर में बरसात के कारण फसल में तेज़ी से कीट लग गये। जमीन से लेकर जेवर तक सब कुछ गिरवी पर रखा गया था।

नक़दी फसल: कपास

वजह: कीटनाशक खरीदने के लिये किसानों ने भारी उधार लिये थे। फसल में कीट लग गये और कितना कीटनाशक इस्तेमाल करना था, इसकी किसानों को जानकारी न थी, इसलिये उनके सारे सपने धूल में मिल गये।

विकास पर एक प्रश्नचिन्ह लगाता है बिजली, पानी की समस्या

हर साल की तरह इस साल भी देश के लोगों को गर्मी के मौसम से उत्पन्न संकटो का सामना करना पड़ा, चाहे वो हिन्दोस्तान की राजधानी दिल्ली ही के लोग क्यों न शामिल हो, दिल्ली के लोगों द्वारा मटका फोड़कर क्रोध जाहिर करना, या बिजली विभाग पर रोजाना धावा बोलकर शासक वर्गों को कोसना आदि आदि। ऐसे में अन्य राज्यों के लोगों का ईश्वर ही मालिक है।

ऐसा नहीं है कि इस गर्मी के मौसम से उत्पन्न बिजली, पानी आदि की समस्या का दर्शन हम प्रथम बार कर रहें हो बल्कि यों कहिये ये संकट हमारी सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चुनौती देने की मुद्रा की स्थिति में रहती है और दिल्ली के लोगों को एक वर्ष के लिये अपनी याद दे जाती है तथा हमारी सरकार की निकम्मीपन को दर्शाती है। सरकार भी महज थोड़े आंसू व आश्वासन की बौछार करके यूं खामोश हो जाती है जैसे एक खराब फुलझड़ी।

ऐसा नहीं कि हमारी सरकार के पास ऐसे पूर्वअनुमानित संकटो को रोकने के लिये साधन नहीं है परन्तु वो ऐसा क्यों करें क्योंकि गर्मी से शासक वर्गो के सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। बिजली, पानी आदि की समस्या उनको परेशान करने के लिये नहीं, बल्कि उनके शासन के अंर्तगत आम लोगों की है।

देश के शासक वर्गों द्वारा तकनिकी, व आर्थिक विकास के आंकड़ों को दिखाया जाता है कि हमारा देश अब विकसित देश की ओर बढ़ रहा है, परन्तु असलियत तो यह है कि बिजली,पानी आदि जैसी छोटी-छोटी समस्याएंे हमारे विकास को लात मार कर सरकार के विकाश के आंकडा़े की औकात दिखा जाती है।

रूस में पूंजीवादी संकट

रूसी संघ एक संकट से दूसरे संकट तक लड़खड़ा रहा है। यह मुल्क जो किसी समय दुनिया के मजदूर-मेहनतकशों और सभी प्रगतिशील लोगों का सपना था, आज गहरे पूंजीवादी संकट मंे फंसा हुआ है।

जब मास्को के शेयर बाज़ार से सूचकांक अचानक गिर गये और फिर जून महीने की शुरुआत में कुछ स्थिर हुये, तो यूरोप, अमरीका और दुनिया भर के वित्त बाजारों में तहलका मच गई। ब्याज दर 60 फीसदी से 150 फीसदी के बीच मंडराते रहे और दिवालिया राज्य की तिजौरी से नोटों का नीलाम कर दिया गया, ताकि इस संकट काल में पैसा इकट्ठा किया जाये। जी-8 देशों की सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय उधार संस्थानों ने रूसी मुद्रा को पूरी तरह गिरने से बचाने के लिये फौरन कदम उठाये। रूस के प्रधान मंत्री विदेशी बैंकरो से मिलने पैरिस भागे। रूसी राष्ट्रीपति ने इस संकट से बचने के तरीके निकालने के लिये रूस के सर्वोच्च दस व्यापार प्रशासकों के साथ आपात्कालीन मीटिंग बुलाई।

इस संकट ने रूस में आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उथल पुथल को स्पष्ट कर दिया है। सोवियत संघ और उसकी राजकीय इजारेदार पूंजीवादी व्यवस्था के खत्म हो जाने के बाद जब से रूस ने “बाज़ार अर्थव्यवस्था” और “बहुदलीय लोकतंत्र” अपनाया है, तब से ऐसा होता आ रहा है। यह जानी मानी बात है कि रूस के बड़े व्यापार घराने ही, कुछ अमरीकी मदद सहित, 1996 में येल्तसिन के राष्ट्रपति चुने जाने के लिये जिम्मेदार थे। आज रूस की सम्पूर्ण निजी सम्पत्ति की लगभग 50 फीसदी इन दस व्यापार घरानों के हाथों में है। हालांकि उन्होंने कई अरबों डालर टैक्स नहीं दिये, पर येल्तसिन की सरकार ने इस बात को नजरंदाज़ कर दी है। मास्को में राज्य की तिजौरी खाली है। कई महिनों से मजदूरों को वेतन नहीं मिले, सेवानिवृत्त मजदूरों को पेंशन नहीं मिले। पूरे रूस में बग़ावत फैली हुई है, मजदूर वेतन और पेंशन की मांगों को लेकर काम बंद कर रहे हैं, इत्यादि। परन्तु रूसी इजारेदारों ने राष्ट्रपति को आदेश दिया है कि काम बंदी को रोकने के लिये पुलिस को ज्यादा अधिकार दिये जायें और ऐसे नये कानून बनाये जाये।

आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उथल पुथल

पिछले 8 सालों में रूस की अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर, निर्यात के लिये तब्दील कर दिया गया है। निर्यात क्षेत्र, खास तौर पर कच्चे माल के निर्यात में भारी निजीकरण की गई है, और सबसे ज्यादा विदेशी सहयोग भी है। 1996-97 में रूस का 75 फीसदी कच्चा माल एशिया को निर्यात हुआ था। परन्तु एशिया के वित्त संकट के साथ साथ, ये निर्यात भी घट गये हैं और इस क्षेत्रक की कई कम्पनियों के मुनाफे़ खत्म हो गये हैं। पश्चिम यूरोप में अब यह डर है कि रूसी अर्थव्यवस्था के गिरावट से बहुत नुकसान होगा क्योंकि यूरोप का 15 फीसदी निर्यात रूस को है। यूरोपीय और अमरीकी बैंको को यह डर है कि एशिया और लैटिन अमरीका की तरह, अगर रूस की अर्थव्यवस्था भी गिर जाती है तो पहले यूरोप और फिर अमरीका में इसके भयानक अंजाम होंगे।

रूस की अर्थव्यवस्था के गिरावट से अंतर्राष्ट्रीय वित्त संस्थानों को यह भी डर है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को दसों अरबों डालर डालने पडें़गे, रूस की हालत सुधारने के लिये। फिर दुनिया भर में “बाज़ार अर्थव्यवस्था” की विश्वसनीयता घट जाएगी। पूंजीवादी व्यवस्था की नाकामयाबी से लोगों का ध्यान हटाने के लिये नई चालें चली जायेंगी।

अमरीका के कुछ इजारेदार दल रूस को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा या किसी और प्रकार की वित्त सहायता देने के खिलाफ़ हैं। वे यह चाहते हैं कि इन हालतों से फायदा उठाकर रूस को ऐसा धक्का दिया जाये कि वह फिर कभी दुनिया में अमरीका का मुकाबला करने के काबिल न हो सकें।

इन दोनों गुटों के बीच अंतरविरोध आने वाले दिनों में और तेज़ होगा।

रूसी इजारेदार पूंजीपति रूस को एक आर्थिक और फौजी महाशाक्ति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पूंजीवादी रूस ने यह ऐलान कर दिया है कि वह अपनी सीमाओं के अन्दर अलग-अलग राष्ट्रीयताओं की मांगों को कोई सुनवाई नहीं देगा। रूस ने कई बार भूतपूर्व वारसा पैक्ट के देशों को अपना गुलाम बनाने की इच्छा प्रकट की है। हाल ही में उन्होंने नेटो की पूर्व दिशा में विस्तार करने की कोशिशों का विरोध किया था। शीत युद्ध के बाद की अवधि में रूस चीन, यूरोप और अमरीका के साथ अलग अलग दांवपेच चला रहा है, ताकि दुनिया में अपनी भूतपूर्व स्थिति को फिर से वापस ला सकें।

रूस में संकट वहां की तथा सारी दुनिया की जनता के लिये बहुत खतरनाक है। करोड़ों लोगों की कंगाली और रूस व दुनिया के लोगों के लिये युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, परन्तु इजारेदार अपने मुनाफों को बचाने में लगे हुये हैं।

 

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